जीवन जीने के दस सूत्र - खुशवंत सिंह (Khushwant Singh)

बेहतर जीवन जीने के दस सूत्र – खुशवंत सिंह (Khushwant Singh)

खुशवंत सिंह ( Khushwant Singh) जी ((born Khushal Singh, 15 August 1915 – 20 March 2014) ने 98 साल की खुशहाल जीवन यात्रा की. पूरा भारत उनको जानता है जो दो बार पद्म विभूषण से नवाज़े गए. 1974 में और पुन:  2007 में. Operation Blue Star के कारण  1974 का पद्म विभूषण उन्होंने 1984 में वापिस कर […]

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जगत का बोध

जगत का बोध भी करना जानिये – आत्मिक लाभ ज़रूर मिलेगा

एक सीधा सादा वैरागी साधू जिसे जगत का बोध नहीं था; विचरण करते करते थका, प्यासा हो गया था. किसी नदी के पनघट पर पहुंचा, पानी पिया और सुस्ताने का मन हुआ. पत्थर पर सिर रखकर सो गया….!!! पनघट पर पनिहारिन आती-जाती रहती हैं !!! वे आईं और साधू को सोते देखा. एक ने कहा- […]

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जीवन है अनमोल जीवन सार जीवन का अर्थ जीवन उपहार है

जीवन है अनमोल – जानिये, कितने भाग्यशाली हैं आप

जीवन के कई अर्थ लगाये जा सकते हैं. लेकिन सभी अर्थ और भावार्थ एक ही लक्ष्य को इंगित करते हैं. कि ‘जीवन है अनमोल’ बुरा कहने से बचें… सोचिये उनके बारे में, जो बोल भी नहीं सकते. हमें वाणी मिली है…. कितनी बड़ी ईश्वरीय देन है. जब मुख-जिव्हा स्वादिष्ट व्यंजन ही पसंद करते हैं. तो […]

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जीवन है संग्राम

जीवन है संग्राम – जगत में कहीं नहीं विश्राम

जीवन है संग्राम – संसार में यदि कहीं कोई जगह या स्थिति है जहाँ पूर्ण आनंद और शांति मिले… तो वह है, परमेश्वर का सानिध्य ध्यान, सिमरन, जाप, कीर्तन-भजन; सानिध्य के साधन हैं. यह गायन इसी आशय की जीवंत प्रस्तुति है. जीवन है संग्राम सुनिए और आनंद लीजिये अलोक सहदेव जी के इस मधुर गायन […]

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दुनियां में सिकन्दर कोई नहीं duniya-mein-sikandar-koi-nahin

दुनियां में सिकन्दर कोई नहीं, वक्त ही सिकंदर होता है

सिकन्दर उस जल की तलाश में था, जिसे पीने से मानव अमर हो जाते हैं.! काफी दिनों तक देश दुनियाँ में भटकने के पश्चात आखिरकार सिकन्दर ने वह जगह पा ही ली, जहाँ उसे अमृत की प्राप्ति होती ! वह उस गुफा में प्रवेश कर गया, जहाँ अमृत का झरना था, वह आनन्दित हो गया […]

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तुम ही मैं हूँ, फिर चिन्तन क्या, मैं ही तुम हो, फिर उलझन क्या

तुम ही मैं हूँ, फिर चिन्तन क्या – आलौकिक भजन

तुम ही मैं हूँ, फिर चिन्तन क्या, मैं ही तुम हो, फिर उलझन क्या आदरणीय आलोक सहदेव जी द्वारा श्रीरामशरणम् को समर्पित आलौकिक भजन, तुम ही मैं हूँ, फिर चिन्तन क्या आपजी की सेवा में प्रस्तुत तुम ही मैं हूँ, फिर चिन्तन क्या, मैं ही तुम हो, फिर उलझन क्या तुम ही मैं हूँ, मैं ही तुम […]

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भक्तिमय कर्मयोग

भक्तिमय कर्मयोग – जीवन जीने की आसान कला

परम पूज्य श्री डॉ विश्वामित्र जी महाराज श्री के मुखारविंद से जो अपने आप को, परमात्मा को समर्पित कर देता है, परमात्मा उसे अपने अनुसार चलाता है। यह बहुत गहरा भेद आ जाता है, उसे वह अपने अनुसार चलाता है। कर्मों के अनुसार नहीं चलाता। मानो जो उसके कर्म हैं, संचित भी है, भले ही शास्त्र […]

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प्रारब्ध सार

डॉ गौतम चैटर्जी जब आत्मा शरीर तत्व को प्राप्त करता है उसको प्रारब्ध भी मिलते हैं। भाग्य की यात्रा और कुछ नहीं बल्कि तपिश सहना है, जैसे सोना जब गर्म किया जाता है तब उसकी चमक व निखार उभरता है। यह तप व राम नाम आराध्य तपस्या भाग्य की एक सम्पूर्ण यात्रा में परिवर्तित हो जाती […]

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