बचिये, खानपान सम्बन्धी इन 5 आधारहीन बातों से

बचिये, खानपान सम्बन्धी इन 5 आधारहीन बातों से

पोषण विशेषज्ञ हमें आहार सम्बन्धी कई विरोधाभासी परामर्श देते रहे हैं. इनमें से कई परामर्श या तो सच्चाई से मीलों परे एवं तथ्यों से सर्वदा भिन्न रहे हैं, या फिर अब शोधों द्वारा नकारे जा चुके हैं. बचिये, खानपान सम्बन्धी इन 5 आधारहीन बातों से, क्योंकि इन आधारहीन बातों से हमारी सेहत का नुक्सान ही हुआ है – लाभ बिलकुल भी नहीं मिला है.

बचिये, खानपान सम्बन्धी इन 5 आधारहीन बातों से

आइये, पोषण सम्बन्धी ऐसे कुछ तथ्यहीन परामर्शों का अवलोकन करें जिनके कारण हमारी सेहत से खिलवाड़ होता रहा है.

बड़ी बात यह भी है कि यह सारे परामर्श ऐसे शोधों पर आधारित थे जो वैज्ञानिक तरीके से किये ही नहीं गए थे.

केवल फौरी शोध या जानवरों पैर हुए इक्का दुक्का विश्लेष्ण करके ही इन्हें प्रचारित प्रसारित कर दिया गया.

और यह ऐसे व्याप्त हो गए जैसे भेड़िया आया – भेड़िया आया वाली कहानी.

1. क्या घी, मक्खन या तृप्त वसा (Saturated fat) हानिकारक होते हैं?

हमारे बुज़ुर्ग, घी मक्खन की महता बताते रहे हैं.

30-40 साल पहले तक मोटे आदमी को ढूँढना एक मुश्किल काम था.

जब से बताया जाने लगा कि घी मक्खन नहीं खाना चाहिए, तब से ही मोटापा, डायबिटीज, थाइरॉयड समस्या, ओस्टेओपोरोंसिस, दिल के रोग हमारी पीढ़ी (जनरेशन) के अभिन्न अंग बन गये.

पिछले कुछ दशकों के आधे अधूरे शोधों से हमारी ऐसी धारणा बनाई गयी कि मक्खन, घी, का हर चम्मच, तेल की हर बून्द सीधे हमारे ह्रदय में पहुँच कर कोलेस्ट्रॉल जमा कर देती है.

और हमारी धमनिया सिकुड़ जाती हैं और ब्लॉक हो जाती हैं.

हमें बताया गया कि ह्रदय रोग का मुख्य कारण अधिक तेलयुक्त आहार का होना है.

विशेषकर तृप्त वसा (Saturated fat) वाले आहार, जैसे घी, मक्खन, तेल इत्यादि.

भोजन में वसा को मोटापे का मुख्य कारण भी माना जाने लगा.

परिणामस्वरूप, तेल घी का उपयोग एक खलनायक के रूप में स्थापित हो गया.

यह पिछले शोध बिना किसी सबूत के ही लोकप्रिय बना दिए गए थे.

किसकी कारगुज़ारी

वास्तव में, पुराने शोधों के पीछे उन सरकारी संस्थाओं एवं शोधकर्ताओं की कारगुज़ारी थी जिन्हे अरबों खरबों का योगदान ऐसी कम्पनियों से मिलता है जिनके हित हमारी सेहत से अधिक अपने उत्पाद बेचना है।

उनका सेहत से कभी भी सरोकार रहा ही नहीं.

उनका सरोकार केवल ऐसे उत्पाद बनाना है  जिससे ग्राहक एक नशेड़ी की तरह उनके उत्पाद बार बार खरीदें; जिसके लिये चाहे उन्हें पेस्टिसायड का उपयोग क्यों न करना पड़े।

आपको जान कर हैरानी होगी कि कोकाकोला, केलॉग्स, नेसले इत्यादि अन्य कई; इन शोध संस्थाओं एवं शोधकर्ताओं पर अथाह धन  खर्च करते हैं।

और दुनियाभर की सरकारें सब जानते हुये भी लाचार हैं।

समस्या यह भी है कि एक साधारण नागरिक या डॉक्टर सच्चाई जानने के लिये किस पर विश्वास करे। व्यवसायिक हितों के आगे सब विवश हैं.

क्या है… घी, तेल की सच्चाई

1970 के दशक के यह शोध अब असत्य साबित हो रहे हैं.

2010 में जब इस प्रकार के शोधों का (जिसमें 347747 लोगों के अध्ययन किये गए थे) पुनरावलोकन किया गया तो पता चला कि…

घी, तेल, चर्बी जैसी तृप्त वसा एवं ह्रदय रोग का आपस में कोई सम्बन्ध होता ही नहीं है. ( देखिये 1)

हाल ही में हुए कई शोधों ने पाया है कि घी, चर्बी, तेल का मोटापे, ह्रदय रोग या डायबिटीज से कोई सम्बन्ध नहीं होता. (देखिये 2)

दुनिया भर के वे वैज्ञानिक जो बड़ी कंपनियों की  ऐसी कारगुजारी से वाकिफ थे, ने हाल ही के नए शोधों में पाया है कि यदि पिज़्ज़ा पेप्सी का कॉम्बिनेशन लगातार 15 दिन तक लिया जाए तो उसके बाद आपको घर का भोजन अच्छा लगेगा ही नहीं.

कोलेस्ट्रॉल का महत्त्व

हमारे शरीर में कोलेस्ट्रॉल का एक एहम योगदान होता है.

सच्चाई यह है कि कोलेस्ट्राल हमारे दिमाग़ और नरवस प्रणाली का एक अति महत्वपूर्ण एवं मुख्य आधार है, जिसके बिना हम जिन्दा नहीं रह सकते.

शरीर की ज़रूरत के लिये कोलेस्ट्रॉल का निर्माण हमारा लिवर स्वयं करता  है.

ऐसा कभी  नहीं होता कि लिवर किसी कोलेस्ट्रॉल युक्त आहार से कोलेस्ट्रॉल निकाल कर हमें दे.

सच्चाई ये भी है कि घी, मक्खन, तेल से युक्त भोजन हमारे शरीर में HDL ( अच्छी कोलेस्ट्रोल) को बढाने में सहायक होते है.

साथ ही यह सूक्ष्म VLDL (हानिकारक कोलेस्ट्रोल) को बड़ी LDL (जो कि हानिरहित है) में बदलने का काम भी करते है  ( देखिये 34).

घी, तेल से रोग नहीं होते

आप कुछ भी खाइए; घी, मक्खन, पनीर, सरसों, नारियल, मूगफली के तेल, अंडा, मांस, मछली; चिंता की न तो कोई वजह है न ही आधार.

शोधों ने यह साबित कर दिया है कि तृप्त वसा से कोई ह्रदय रोग नहीं होता.

इसके विपरीत, वसा युक्त आहार सेहत के लिये लाभदयक है, जिससे हम डायबिटीज, आर्थराइटिस, मोटापा, थाइरोइड इत्यादि रोगों से बचे रह सकते हैं.(5, 6, 7, 8).

यह भी सिद्ध हो गया है कि वसायुक्त आहार मोटापे का कारण नहीं होता.

मोटापे का मुख्य कारण घी तेल जैसी वसा का कम उपयोग ही है जिस कारण हमारा लिवर प्रत्येक भोजन से कोलेस्ट्रॉल निकालकर अनावश्यक मोटापे को बढ़ावा देने लग जाता है.

जैसे ही कभी कभार हम वसा युक्त खानपान करते हैं तो उसका मुख्य भाग वसा में तब्दील हो जाता है।

एक चौंकाने वाली सच्चाई

कोलेस्ट्रॉल पर हुए शोधों के चलते, 2015 में, अमेरिका ने कोलेस्ट्रॉल को ह्रदय की सेहत पर प्रभाव डालने वाली लिस्ट में से हटा दिया है.

ये तब जाकर हुआ है जब दवा कम्पनियां अरबों खरबों की दवाईयां कोलेस्ट्रॉल कण्ट्रोल करने के नाम पर बेच चुकी हैं.

निष्कर्ष: तृप्त वसा से ह्रदय रोग, मोटापा, डायबिटीज जैसी समस्याएं नहीं होती.

वसा युक्त आहार तंदुरुस्त रहने के लिये अत्यंत महत्वपूर्ण है. कोलेस्ट्रॉल जीवन के लिये अति महत्वपूर्ण है जिसके बिना हम जिन्दा भी नहीं रह सकते.

2. क्या प्रोटीन हड्डियों एवं किडनी के लिये नुकसानदायक है?

प्रोटीन को ओस्टेओपोरोसिस तथा किडनी रोगों का मुख्य कारण बताया जाता रहा है.

जबकि प्रोटीन हमारे आहार का एक मुख्य अंश होना चाहिए.

प्रोटीन से ही शरीर पहले आकार में बढ़ता है तथा बाद में, प्रोटीन के कारण ही शरीर का रख रखाव व मुरम्मत संभव हो पाते है.

हमारी मूलभूत संरचना व रखरखाव का कारक प्रोटीन ही है.

बिना प्रोटीन के हड्डियों तक कैल्शियम व फॉस्फोरस पहुँच ही नहीं पाएंगे.

सच्चाई ये है कि दीर्घ अवधि में प्रोटीन पुराने कैल्शियम की जगह नए कैल्शियम से हड्डियों को मज़बूत कर उन्हें लचीला बनाने में सहायता करती है जिससे हड्डियों के टूटने कि सम्भावना कम हो जाती है (देखिये 910).

इसी प्रकार किसी भी शोध ने ये नहीं पाया कि किसी सेहतमंद व्यक्ति द्वारा अधिक प्रोटीन के सेवन से किडनी रोग का कोई सम्बन्ध है (देखिये 1112).

हाँ यह अलग बात है कि रोगग्रस्त किडनी कि दशा में कम प्रोटीन की सलाह दी जाती है ताकि किडनी पर अतिरिक्त बोझ न पड़े.

प्रोटीन की अहमियत

मधुमेह तथा उच्चरक्तचाप किडनीरोग के मुख्य दो कारण हैं.

और अधिक प्रोटीन का सेवन इन दोनों रोगों से बचने के लिये कारगर है (देखिये 1314).

अधिक प्रोटीन का सेवन स्वस्थ हड्डियों के लिये अनिवार्य है.

सेहतमंद व्यक्ति की किडनी पर अधिक प्रोटीन का कोई विपरीत प्रभाव नहीं होता.

3. क्या अंडे हानिकारक होते हैं?

पिछले आहार विशेषज्ञ प्रकृति के कुछ बेहतरीन आहारों को विपरीत नज़रिए से देखते रहे हैं.

अंडा इसका सटीक उदाहरण है. वे ये बताते रहे कि अण्डों में अधिक कोलेस्ट्रॉल होता है इस कारण हमें नहीं खाना चाहिए.

बताया गया कि अंडे की कोलेस्ट्रॉल हमारी कोलेस्ट्रॉल को बढ़ा देती है.

इस कारण इन्हें हृदयरोग का कारक भी बताया जाता रहा.

सलाह मिलती रही कि अंडे को न खाना ही उचित है.

यदि खाना ही हो तो इसे बिना योक (जर्दी) के खाना चाहिए, वगैरह वगैरह.

उनके परामर्श को वैसे ही समझिये जैसे केवल ईंटों से घर बनाने की चेष्टा करना.

सभी जानते हैं कि घर बनाने के लिये  ईंट, सीमेंट, रेत, बजरी इत्यादि सबकी आवश्यकता रहती है.

क्यों होते हैं अन्डे बेहतरीन आहार

अंडे वास्तव में धरती पर उपलब्ध पौष्टिक आहारों में से एक हैं जिनमें हर पौष्टिक एवं अंटीऑक्सीडेंट तत्वों का पूर्ण संतुलन पाया जाता है.

यदि अंडे की ज़र्दी (Yolk) छोड़ केवल सफेदी ही खायेंगे तो आपको केवल प्रोटीन ही मिलेगा, जो किसी अन्य पोषक तत्व के बिना पूरा व्यर्थ जायेगा.

शोधों से यह सिद्ध हो गया है कि आहार में पाई जाने वाली कोलेस्ट्रॉल का शरीर की रक्त कोलेस्ट्रॉल से कोई सीधा सम्बन्ध नहीं होता.

हमारे शरीर की कोलेस्ट्रॉल लिवर बनाता है न कि ये हमें आहार से प्राप्त होती है.

दूसरी बात, अंडे खाने से लिवर अच्छी मानी जाने वाली कोलेस्ट्रॉल (HDL) को बढाता हैं न कि खराब कही जाने वाली कोलेस्ट्रॉल को.

अंडे के सेवन का दिल के रोग से भी कोई सम्बंध् नहीं (देखिये1516).

इनमें बेहतरीन एंटीऑक्सीडेंट होते हैं जो हमारी आँखों व मस्तिष्क के लिये अत्यंत लाभकारी माने गए हैं  (देखिये 17).

अंडे उच्च वसायुक्त आहार होते हुए भी अनाज (रोटी, ब्रेड इत्यादि) की अपेक्षा अधिक महत्वपूर्ण रूप से वजन घटाने में सहायक सिद्ध हुए हैं (देखिये 1819)

निष्कर्ष: अंडे में उच्च कोटि के पौष्टिक तत्व होते हैं जो वजन घटाने में सहायक है एवं आँखों व मस्तिष्क के लिये लाभकारी हैं.

अंडे खाने से ह्रदय रोग नहीं होता, न ही अंडे की कोलेस्ट्रॉल का हमारी अपनी कोलेस्ट्रॉल से कोई सम्बन्ध है.

4. क्या दिन में कई छोटे भोजन लेना ठीक है?

आमतौर पर बताया जाता है कि आपको दिन भर में कई बार छोटे छोटे भोजन लेने चाहिए.

यह बताया जाता रहा कि इससे मेटाबोलिज्म क्रिया ठीक रहती है.

अपने आप को हमेशा भर-पेट रखना मानव जाति की मूल प्रकृति नहीं है.

हमारे पूर्वजों को भोजन न मिलने पर भूखे भी रहना बढता था.

मानव प्रजाति एवं अन्य कई प्राणी तंदरुस्त रहने के लिये पुरातन काल से ही उपवास भी करते रहे हैं.

भोजन लेने से मेटाबोलिज्म क्रिया सक्रिय होती है.

लेकिन दिन भर में लिये गए कुल भोजन की मात्रा ही उर्जा का निर्धारण करती है.

न कि यह कि आपने कितनी बार भोजन लिया है.

बार बार छोटे आहार लेने का मतलब है मेटाबोलिज्म क्रिया का बार बार ऊपर नीचे होना.

जबकि दो या तीन मुख्य आहार लेने का मतलब है…

मेटाबोलिज्म का धीरे धीरे लम्बे समय तक क्रियाशील रहना.

इससे ये सिद्ध होता है कि किसी को भी छोटे अल्प भोजन बार बार लेने कि ज़रुरत नहीं.

बार बार छोटे भोजनलेने से मेटाबोलिज्म का बेहतर होना एक पूर्ण मिथ्या है, जिसका कोई आधार नहीं है.

यदि ऐसा करते हैं तो आप निश्चित ही मोटापे को आमंत्रित कर रहे है.

बार बार छोटे भोजन खाना मोटापे को आमंत्रण देना है, जिस कारण आप वज़न घटाने में असमर्थ हो सकते हैं.

दिन में दो या तीन बार खाईये, अधिक नहीं

सत्यार्थ में, कई छोटे भोजन वाली थ्योरी अनेकों बार शोधों में नकारी गई है.

नियंत्रित शोधों ने; जिनमें एक समूह को कई छोटे छोटे भोजन दिए गए तथा दूसरे समूह जिसे केवल दो बार भोजन दिया गया; कुछ भी फर्क नहीं पाया. (देखिये 2021).

जब हम दो भोजन के बीच लम्बा अन्तराल रखते हैं तो हमारी कोशिकीय क्रियाशीलता हमारी विकृत द्रव्यों (toxins) का बेहतर निष्कासन कर शरीर को स्वच्छ कर देती है (देखिये 22)

शोध दर्शाते हैं कि जो दिन में 4 बार भोजन लेते हैं उन्हें गुदा (Colon) के कैंसर कि सम्भावना 90% तक अधिक हो जाती है. (देखिये 232425).

दिन में बार बार छोटे भोजन लेने से कोई लाभ नहीं होता.

बार बार खाने से कोलन केंसर की सम्भावना अधिक हो जाती है.

शरीर में संचित विकारद्रव्य निकालने के लिये हमें उपवास भी रखने चाहिए.

5. क्या नमक कम खाना चाहिए?

कम नमक खाने की मिथक भी खूब प्रचलन में है.

हर आये दिन यह ज्ञान किसी से भी मिल जायेगा कि कम नमक खाओ नहीं तो BP बढ़ जाएगा.

इन सब के पीछे 1971 में किया एक शोध था, जिसमें चूहों को अत्यधिक नमक खिलाया गया था.

और बताया गया कि नमक से चूहों का BP बढ़ जाता है.

आदमी के हिसाब से यह मात्रा 500 ग्राम यानि आधा किलो रोज़ की थी.

अब आप सोच सकते हैं कि आधा किलो नमक खाने पर किसी इंसान की क्या हालत हो सकती है.

चूहों पर किये गए इस परीक्षण की अफवाह ऐसी फैली कि नमक को हाई ब्लड-प्रेशर का कारक माना जाने लगा.

यह सब बिना किसी मानव शोध के कारण हुआ.

कोई भी पुख्ता वैज्ञानिक शोध ये नहीं कहता कि नमक के कारण BP बढ़ जाता है.

केवल नमक के प्रति संवेदनशील रक्तचाप में ही अधिक नमक से नुक्सान होता है (देखिये 27)

सच यह है कि ज़रुरत से कम नमक खाने से कोलेस्ट्रॉल 7% से 15% तक बढ़ जाती है.

यह गौरतलब है, कि बहुत ही कम लोग नमक संवेदक रक्तचाप के अपवाद हो सकते हैं.

सारशब्द

आहार सम्बन्धी कई भ्रांतियों के कारण विश्व जनसँख्या के एक बड़े तबके ने खामियाजा उठाया है.

जिस कारण मोटापा, डायबिटीज, आर्थराइटिस जैसे रोगों को पनपने का मौका मिला है.

समय रहते हमें चेत जाना चाहिए व अपनी नैसर्गिग खानपान परम्पराओं को अपनाना चाहिए.





 

Digiprove sealCopyright protected by Digiprove © 2017
शेयर कीजिये

आपके सुझाव - कमेंट्स

Posted in Health Facts स्वास्थ्य सार, Nutrition पोषण.