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थाइरॉयड समस्या – आखिर क्यों काम नहीं करते इलाज

थाइरॉयड समस्या thyroid rog ka ilaj upay hindi

यदि आप थाइरॉयड समस्या झेल रहें हैं तो यह लेख आपके लिए आँखें खोल देने वाला हो सकता है.

कारण, आजकल सोशल मीडिया में इस रोग के इतने इलाज बताये जाते हैं कि कई बार तो लगता है जब इस रोग के इलाज पर इतना ज्ञान उपलब्ध है तो फिर ये रोग अब तक धरती पर बचा कैसे हुआ है.

इलाज के नुस्खे भी ऐसे बताये जाते हैं जैसे कि इलाज न होकर सब्जी मंडी से आपको सब्जी खरीदने के लिए कहा जा रहा हो. 

लेकिन, जब ऐसे कई नुस्खे और इलाज आपकी समस्या ठीक नहीं कर पाते

तब आप समझ जाते हैं कि यह इतना आसान नहीं है जितना कि इसे बताया जाता है. 

ऐसे में आपको ये जानना ज़रूरी हो जाता है कि थाइरॉयड समस्या आखिर है क्या; और इसके सही विकल्प क्या हैं.

भारत में थाइरॉयड समस्या

Indian Journal of Endocrinology and Metabolism, July 2013 में प्रकाशित एक अध्यन में बताया गया कि भारत में सर्वे की गयी 5,360 आबादी के 10.85 लोग इस समस्या के शिकार थे.

इस संख्या में महिलाओं की संख्या पुरुषों से तीन गुना अधिक थी.

अर्थात प्रति चार व्यक्तियों में तीन महिलाएं और एक पुरुष इस रोग के शिकार थे.

चौंकाने वाला तथ्य यह भी सामने आया कि लगभग एक तिहाई लोगों को पता ही नहीं था की उन्हें कोई थाइरॉयड समस्या है.

बड़ी बात यह है कि भारत में यह रोग अभी अपने पैर पसार ही रहा है.

अभी इसकी गिरफ्त में केवल शहरी आबादी के लोग ही अधिक हैं.

हाइपोथायरायडिज्म की समस्या थाइरॉयड की सबसे बड़ी समस्या है.

इसी कारण Levothyroxine जो की एक कृत्रिम थाइरॉयड हॉर्मोन हैं, की बिक्री सबसे अधिक बिकने वाली दवाओं में शुमार हो गयी है.

क्या हैं लक्षण

वजन का अकारण बढ़ने लगना,

डिप्रेशन,

कब्ज़ का बने रहना,

त्वचा का रूखापन,

बालों का झड़ना,

एनीमिया,

आवाज़ में भारीपन,

ठण्ड गर्मी अधिक लगना,

अनियमित मासिकधर्म, बांझपन,

मस्सल्स में अकडन,

दिमागी सूझबूझ में कमी, भ्रमकारी नकारात्मक सोच,

दर्द और अन्य कई बेकार लक्षणों से यह रोग पहचाना जाता है.

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थाइरॉयड हॉर्मोन्स का सीधा सम्बन्ध दिमागी क्रियाओं, पेट क्रियाओं, रक्तसंचार,

हड्डियों के रख्ररखाव, लाल रक्त कोशिकाओं के चयापचय, लिवर और गालब्लैडर की क्रियाओं,

स्टेरॉयड होरमोंस के उत्पादन, शुगर नियंत्रण, लिपिड और कोलेस्ट्रॉल नियंत्रण,

प्रोटीन के चयापचय और शरीर के तापमान नियंत्रण से रहता  है.

थाइरॉयड का काम

वास्तव में शरीर की हर कोशिका में थाइरॉयड होरमोंस ग्रहण करने के रिसेप्टर्स लगे रहते हैं.

यह हॉर्मोन शरीर की उन सब प्राथमिक मूलभूत क्रियाओं के लिए ज़रूरी होता है जो अन्य साड़ी उच्चस्तरीय क्रियाओं को नियंत्रित करती हैं.

आप इसे ऐसे समझिये कि थाइरॉयड हमारे शरीर रुपी इंजन का मुख्य गियर (Gear) अथवा गरारी है.

यदि यह गियर टूट जाए तो इंजन के बाकी सारे हिस्से काम ही नहीं कर पाएंगे.

क्या कमी है इलाज में

हाइपोथायरायडिज्म से पीड़ित लोगों के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह है कि इलाज के पारम्परिक और वैकल्पिक तरीके बुरी तरह से नाकाफी हैं.

नतीजा यह होता है कि भांति भांति के इलाज करने पर भी राहत नहीं मिल पाती.

आईये जानते हैं कि:

क्यों यह रोग अकसर गलत डायग्नोज़ होता है,

थाइरॉयड रोगियों की लैब टेस्ट रिपोर्टस क्यों भ्रामक होती हैं,

क्यों पारम्परिक इलाज काम नहीं कर पाते, और

कैसे आप इस रोग को पैदा करने वाले कारकों का उपचार कर थाइरॉयड समस्या से राहत पा सकते हैं.

आपको शायद हाइपोथायरायडिज्म की पूरी जानकारी न हो

रोगियों और इलाज करने वालों का यह सपना रहता है कि काश वे किसी एक चीज़ को जान लें जो जादुई तरीके से इस समस्या को ठीक कर देती हो.

पारम्परिक चिकित्सा (conventional medicine) के डॉक्टर कृत्रिम या जैविक हॉर्मोन देकर इसका इलाज पूरा हुआ मान लेते हैं.

जबकि वैकल्पिक चिकित्सा (Alternate medicine) के डॉक्टर आयोडीन की मात्रा घटा कर या बढ़ा कर  इसका इलाज पूरा हुआ मान लेते हैं.

देसी नुस्खे वालों की बात तो छोड़ ही दीजिये.

दुर्भाग्यवश अधिकतर प्रकरणों में इलाज के यह विकल्प नाकाफी साबित होते हैं; विशेषकर दीर्घकाल में.

तो आखिर समस्या कहाँ है.

क्यों समय के साथ साथ होर्मोंस या आयोडीन पद्धति असफल होने लगती है?

आत्मघाती रोगावरोध (auto-immune derangement) है कारण

इसलिए क्योंकि थाइरॉयड समस्या एक प्रलयकारी अथवा आत्मघाती रोगावरोध (auto-immune) के कारण होने वाली बीमारी है.

शोध बताते हैं कि हाइपोथायरायडिज्म के 90% रोगियों के शरीर ऐसे एंटी-बॉडीज (anti-bodies) पैदा करते हैं जो थाइरॉयड ग्रंथि को बचाने की बजाय इसे  नुक्सान पहुँचाना आरम्भ कर देते हैं;

जिस कारण धीरे धीरे थाइरॉयड ग्रंथि थाइरॉयड हॉर्मोन बनाने में अक्षम होने लगती है.

इस आत्मघाती रोगावरोध (auto-immune) को Hashimoto’s disease कहा जाता है.

अधिकतर डॉक्टर ये जानते हैं थाइरॉयड समस्या एक प्रलयकारी रोगाव्रोध (auto-immune) की बीमारी है

लेकिन अधिकतर रोगी इस बात को नहीं जानते.

पारम्परिक चकित्सा

वास्तव में पारम्परिक चकित्सा (Conventional medicine) में auto-immune बीमारियों का कोई भी इलाज अभी तक नहीं विकसित नहीं हुआ है.

न ही इसके विकसित होने की कोई उम्मीद अगले 10-20 सालों में की जा सकती है.

यह पद्धति आज भी रोग के लक्षणों को ठीक करने पर आधारित है न कि रोग को पैदा करने वाले कारणों के इलाज करने में.

पारम्परिक चकित्सा (Conventional medicine) में auto-immune बीमारियों में रोगप्रतिरोधक तंत्र को दबाने के लिए स्टेरॉयडस का उपयोग किया जाता हैं

जिसके दुष्परिणाम और अधिक घातक हो जाते हैं,

जैसे कि sclerosis (टिश्यू का सख्त हो जाना), आर्थराइटिस , IBS संग्रहणी, Crohn’s disease और IBD(पेट की आँतों में सूजन हो जाना) इत्यादि.

इस प्रकार के उपचार से होने वाले दुष्प्रभाव इससे मिलने लाभ से कई गुना अधिक होते हैं.

जब स्टेरॉयड भी काम करना छोड़ देते हैं तो फिर महंगे कृत्रिम हॉर्मोन की ट्रीटमेंट शुरू कर दी जाती है.

फिर जब दूसरे दुष्प्रभाव जैसे डायबिटीज इत्यादि पनपते हैं तो फिर रोगी को इन्सुलिन भी देने लगते हैं.

फिर एड्रेनल ग्लैंड भी प्रभावित होकर रोगी को डिप्रेशन, नींद की कमी इत्यादि देने लगती है.

और इसका भी महंगा इलाज शरू कर दिया जाता है, पूरी उम्र भर के लिए.

है न कमायी का नायाब तरीका?

रोगावरोध समस्या का उपचार

अब देखिये, यदि शरुआत में ही रोगावरोध (auto-immune) समस्या का उपचार कर दिया जाता

तो ये सारी एक के बाद एक बीमारियाँ नहीं पनपती जो जीवन का मज़ा और कमाई दोनों को ही लूट लेती हैं.

यह वैसे ही है कि हम एक बड़ी झील के दूसरे पार जाने के लिए एक छेद वाली नाव लें

और साथ में एक बाल्टी लेकर चल पड़ें कि नाव में पानी भरेगा तो बाल्टी से निकालकर बाहर फेंकते रहेंगे.

नाव और जान बचाने के चक्र में जब बाल्टी से पानी निकालते निकालते थक कर बेहाल हो गये,

तो समझ आया कि अच्छा तो यह होता कि हम चलने से पहले ही नाव के छेद को किसी घासफूस, कपडे या लकड़ी जैसे साधन से बंद कर देते.

न बाल्टी लेनी पड़ती, न ही जान को बचाने के लिए बार बार पानी बाहर निकालना पड़ता.

Hashimoto रोग अकसर बहुआयामी रोगावरोध में परिणित हो जाता है.

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इसका मतलब है कि थाइरॉयड के अतिरिक्त यह अन्य कई एंजाइम और कोशिकाओं को भी प्रभावित करने लगता है, जिनसे Celiac disease, दिमागी खराबी (neurological disorders), एनेमिया (Intrinsic factor), तनाव और भय के दौरे (Glutamic acid decarboxylase)  और  type 1 diabetes जैसे गंभी रोग पैदा हो जाते हैं.

डिप्रेशन के कारण यह रोग आत्महत्या सुसाइड जैसी प्रवृतियों को भी जन्म देते हैं.

यह तब होता है जब कुछ लोग दिमागी तौर से हताश होकर जीवन से मुक्ति पाना ही सबसे अच्छा उपाय मानने लगते हैं.

थाइरॉयड रोग – अन्य समस्याओं की अभिव्यक्ति

हाइपोथायरायडिज्म के अधिकाँश रोगियों को एक बात समझ लेनी चाहिए कि उन्हें थाइरॉयड से कोई समस्या नहीं होती.

थाइरॉयड हॉर्मोन का कम बनना तो केवल एक अभिव्यक्ति (manifestation) मात्र है.

समस्या है तो उनके इम्यून तंत्र में होती है जो थाइरॉयड ग्रंथि पर अकारण ही आक्रमण करता रहता है.

यह समझना बहुत ही ज़रूरी है कि जब इम्यून तंत्र नियंत्रण में नहीं होता तो थाइरॉयड ही नहीं कई और रोग भी पैदा होने लगते हैं

जैसे कि आर्थराइटिस, डायबिटीज, एड्रेनल ग्लैंड की थकान, पेट के रोग वगैरह वगैरह.

जांच के नाकाफी तरीके

बेहतर निदान से ही बेहतर इलाज हो सकता है (best treatment depends on accurate diagnosis).

यदि निदान ठीक नहीं तो इलाज भी ठीक नहीं हो सकता – उलटे नुक्सान भी पहुंच सकता है.

दुर्भाग्यवश, हाइपोथायरायडिज्म की जांच (diagnosis) में अकसर ऐसा ही होता है.

परिदृश्य एक

आप हाइपोथायरायडिज्म के लक्षणों के साथ अपने डॉक्टर के पास जाते हैं;

डॉक्टर आपसे बिना कोई विशेष पड़ताल किये हॉर्मोन दे देते हैं.

परिदृश्य दो

आप हाइपोथायरायडिज्म के लक्षणों के साथ अपने डॉक्टर के पास जाते हैं.

डॉक्टर आपको लैब से टेस्ट के लिए कहते हैं.

टेस्ट सामान्य आते हैं.

डॉक्टर कहते हैं; अरे, आप तो बिलकुल ठीक हो.

यदि आप बताएं कि ऐसा नहीं है तो डॉक्टर आपको डिप्रेशन की दवाई देकर चलता कर देंगे.

अब देखिये, दोनों इलाज भिन्न भिन्न हो गए और दोनों ही गलत हुए.

हाइपोथायरायडिज्म के पांच ऐसे कारण हैं जो सामान्य लैब परीक्षणों में पता नहीं चलते, जब तक कि इनके विशेष टेस्ट न किये जाएँ.

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लेख लम्बा न हो जाए, इसलिए इनके नाम ही दिए जा रहे हैं, व्याख्या नहीं की जा रही.

5 पैटर्न जो लैब में पता नहीं चलते

1. पिट्यूटरी ग्रंथि की अक्षमता से होने वाला हाइपोथायरायडिज्म (HYPOTHYROIDISM CAUSED BY PITUITARY DYSFUNCTION)

2. T4 हॉर्मोन का T3  में पूरा न बदल पाना (UNDER-CONVERSION OF T4 TO T3)

3. TBG बढ़ने के कारण होने वाला हाइपोथायरायडिज्म (HYPOTHYROIDISM CAUSED BY ELEVATED TBG)

4. TBG की कमी के कारण होने वाला हाइपोथायरायडिज्म  (HYPOTHYROIDISM CAUSED BY DECREASED TBG)

5. थाइरॉयड प्रतिरोध (THYROID RESISTANCE)

यह पांच पैटर्न मुख्य हैं.

और भी कई है जो साधारण लैब टेस्टों में पता ही नहीं चलते.

यदि आप में हाइपोथायरायडिज्म के लक्षण हैं लेकिन आपके लैब टेस्ट नार्मल हैं तो संभव है आप में इन पांच या अन्य के पैटर्न हो सकते हैं.

यही नहीं, आपको चाहे जितना मर्ज़ी T4 दे दिया जाए, आपका शरीर उसे T3 में बदल ही नहीं पायेगा.

सामन्यत: होता यह है कि जब आप डॉक्टर को बताते हैं कि T4 दवा काम नहीं कर रही तो डॉक्टर बिना सोचे समझे इसकी खुराक और तेज़ कर देंते हैं.

जब यह भी काम नहीं करती तो खुराक को फिर बढ़ा देंगे.

यह तब तक चलता है जब तक कि हाथ खड़े न हो जाएँ.

अच्छी खबर

यदि एक बार आपके हाइपोथायरायडिज्म का सही विश्लेषण हो जाए तो इलाज भी सही दिशा पकड़ लेता है

और आपको बहुत अच्छा लाभ मिलने लगता है.

सबसे महत्वपूर्ण है उन सब कारकों को हटाना जो ऑटोइम्यून तंत्र को बिगाड़ते हों.

ग्लूटेन (गेंहूँ के उत्पाद), आयोडीन विश्लेषण, सेलेनियम की कमी इत्यादि भी मुख्य कारक हो सकते हैं.

तनावकारी ऑटोइम्यून रोग जैसे एड्रेनल थकान, पेट में IBS संग्रहणी, आँतों का रिसाव इत्यादि का भी इलाज होना चाहिए.

और सबसे ज़रूरी है ऐसी औषधियों का उपयोग जो सिलसिलेवार ऑटोइम्यून विकृतियों का सफाया करें.

यहऔषधियां मुख्यत: वनस्पतियों से तैयार की जाती हैं जिन्हें आधुनिक औषधि जगत में immunity modulators (रोगरोधी) कहा जाता है और आयुर्वेद में त्रिदोषशामक.

गिलोय (Tinospora cordifolia),

दारुहल्दी (Berberis aristata),

गुग्ग्लू (Commifora mukulgum),

गोखरू (Tribulus terrestris),

अश्वगंधा (Withania somnifera) इत्यादि ऐसी वनस्पतियाँ हैं

जो शोध जगत में कारगर रोगरोधी साबित हुई हैं और इम्युनिटी से सम्बंधित रोगों में लाभकारी.

आयुर्वेद सेंट्रल का अमृतयोग नामक उत्पाद इम्युनिटी संतुलन के लिए एक कारगर योग है

जिसे उपयोग कर थाइरॉयड समेत कई अन्य रोगों जैसे जोड़ों के दर्द, चिंता, अनिद्रा, बार बार बीमार पड़ना जैसे विकारों में उपयोग किया जाता है.

इसके नियमित उपयोग से विकारों का सफाया हो जाता है और शरीर में नयी उर्जा का संचार भी होता है.

अमृतयोग का नियमित उपयोग शरीर के कई विकारों का सफाया करने में बेहद सक्षम पाया गया है.

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सारशब्द

थाइरॉयड की समस्या खांसी जुकाम जैसी समस्या नहीं है

कि बिना सोचे समझे, इसका इलाज किया जा सके.

यह एक ऐसा रोग है जो पाया तो थाइरॉयड में है

लेकिन इसके मूल कारक auto-immune तंत्र की खराबी, एड्रेनल ग्लैंड, पिट्यूटरी ग्लैंड, पेट की आँतों में रहते हैं.

ऑटोइम्यून तंत्र के रोग जैसे celiac रोग, ग्लूटेन संवेदनशीलता, IBD इत्यादि भी थाइरॉयड समस्या के कारण होते हैं.

थाइरॉयड की खराबी तो केवल अभिव्यक्ति भर होती है.



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